काशी विश्वनाथ से रामेश्वरम तक और कामाख्या से द्वारकाधीश तक—भारत के समस्त प्रमुख तीर्थों का प्रामाणिक इतिहास, पौराणिक कथाएं, आरती व दर्शन समय-सारणी, वैदिक वेशभूषा नियम, महाप्रसाद और पहुँचने का संपूर्ण मार्गदर्शक। नीचे दिए गए किसी भी बटन पर क्लिक करके सीधे दर्शन करें:

भगवान शिव की त्रिशूल पर बसी काशी नगरी का हृदय स्थल। मान्यता है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले प्राणी को स्वयं भोलेनाथ तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं।

भारत के 12 पावन ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम सोमनाथ महादेव अरब सागर की लहरों पर सुशोभित हैं। यह मंदिर सनातन धर्म की अदम्य आस्था और अमरता का जीवंत प्रतीक है।

उज्जयिनी के राजाधिराज भगवान महाकालेश्वर पृथ्वी के एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग हैं। यहाँ की प्रातः 4 बजे की भस्म आरती पूरे विश्व में अद्वितीय और चमत्कारी है।

उत्तुंग हिमालय के मंदाकिनी तट पर स्थित केदारनाथ धाम शिवभक्तों की परम साधना स्थली है। 2013 की भीषण प्रलयंकारी आपदा में भी इस मंदिर को एक खरोंच तक नहीं आई।
अलकनंदा के किनारे नर और नारायण पर्वत के बीच स्थित बद्रीनाथ जी को भू-वैकुंठ कहा जाता है। यहाँ भगवान विष्णु पद्मासन मुद्रा में ध्यानमग्न होकर संपूर्ण सृष्टि का कल्याण करते हैं।
विश्व के सर्वाधिक पूजित और समृद्ध मंदिरों में शीर्षस्थ तिरुमला बालाजी मंदिर। मान्यता है कि कलयुग में भक्तों के कष्ट निवारण हेतु भगवान स्वयं यहाँ मूर्तिमान रूप में प्रतिष्ठित हैं।
अयोध्या में सरयू तीर पर विराजमान प्रभु श्री राम का नवनिर्मित भव्य मंदिर भारतीय संस्कृति और 100 करोड़ सनातनियों की अखंड आस्था का प्रतीक है। गर्भगृह में 51 इंच की श्यामवर्ण रामलला की मनमोहक मूर्ति सुशोभित है।
चार धामों में पूर्व दिशा के प्रमुख धाम श्री जगन्नाथ पुरी में भगवान कृष्ण अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ दारुब्रह्म (काष्ठ) रूप में साक्षात विराजमान हैं। यहाँ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा सनातन एकता का महाकुंभ है।
हिंद महासागर के पावन द्वीप पर स्थित रामेश्वरम वह महातीर्थ है जहाँ भगवान श्री राम ने लंका विजय से पूर्व बालू से शिवलिंग बनाकर शिव आराधना की थी। मंदिर परिसर के 22 पवित्र कुओं का स्नान समस्त पापों को धो देता है।

भारत के पश्चिमी छोर पर समुद्र तट पर स्थित द्वारकाधीश मंदिर "जगत मंदिर" के नाम से विख्यात है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण चतुर्भुज रूप में राजाधिराज की भाँति सोने के सिंहासन पर विराजते हैं।
असम के गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि है। यहाँ माता सती का "योनि भाग" गिरा था। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं बल्कि प्राकृतिक जलधारा से सिंचित प्रस्तर शिला की पूजा होती है।

जम्मू के कटड़ा में त्रिकूटा पर्वत की पवित्र गुफा में माँ वैष्णो देवी तीन प्राकृतिक पिण्डियों—महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। "चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है" की गूंज से यह धाम 24 घंटे जागृत रहता है।

तमिलनाडु के प्राचीनतम नगर मदुरै में स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर भारतीय शिल्पकला का मुकुटमणि है। यहाँ माता मीनाक्षी की तीन स्तनों वाली मत्स्य-नेत्री कन्या रूप में पूजा होती है जो पहले पूजी जाती हैं और तत्पश्चात भगवान सुंदरेश्वर के दर्शन होते हैं।
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर 108 दिव्य देशमों में विख्यात है। यहाँ भगवान विष्णु 12,008 शालिग्राम शिलाओं से निर्मित 18 फीट लंबी विशालकाय मूर्ति में 5 फनों वाले आदि शेषनाग पर अनंत शयन मुद्रा में तीन द्वारों से दर्शन देते हैं।
मुंबई के प्रभादेवी में स्थित श्री सिद्धिविनायक मंदिर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गणेश मंदिरों में से एक है। यहाँ बप्पा की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जो जाग्रत और तुरंत फल देने वाले "सिद्धि विनायक" का स्वरूप है।
ब्रजभूमि वृंदावन के हृदय स्थल में स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी त्रिभंग मुद्रा में विराजमान हैं। यहाँ की विशेषता है कि ठाकुर जी के सम्मुख घंटी या शंख नहीं बजता और निरंतर पर्दा किया जाता है ताकि कोई भक्त अपनी एकटक दृष्टि से बिहारी जी को मोहित न कर ले।
महाराष्ट्र के नासिक में ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि यहाँ शिवलिंग में तीन छोटे-छोटे अंगूठे के आकार के लिंग हैं जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। यहाँ कालसर्प दोष और नारायण नागबलि पूजा का विशेष विधान है।
झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में "कामना लिंग" के रूप में पूजित है। यहाँ शिव और शक्ति दोनों एक साथ विराजमान हैं क्योंकि मंदिर के ठीक सामने माता पार्वती का मंदिर है और दोनों शिखरों को लाल गठबंधन के वस्त्र से जोड़ा जाता है।
आंध्र प्रदेश के घने नल्लामाला जंगलों में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैलम पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन स्वामी एकमात्र ऐसा पावन तीर्थ है जहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंग (शिव) और 18 महाशक्तिपीठ (माँ भ्रमराम्बा) एक ही परिसर में स्थित हैं।
नर्मदा नदी के बीच मांधाता (शिवपुरी) द्वीप पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का द्वीप अंतरिक्ष से देखने पर साक्षात "ॐ" के आकार का प्रतीत होता है। यहाँ नर्मदा के दोनों तटों पर ओंकारेश्वर और ममलेश्वर के सम्मिलित दर्शन से ही ज्योतिर्लिंग दर्शन पूर्ण माना जाता है।

महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वतों में घने जंगलों के बीच स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भीमा नदी का पावन उद्गम स्थल है। यहाँ भगवान शिव ने कुंभकर्ण के पराक्रमी पुत्र भीमासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी।
गुजरात के द्वारका से 16 किमी दूर स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि यहाँ दर्शन करने वाले को संसार के समस्त विष, सर्पभय और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। मंदिर परिसर में भगवान शिव की 82 फीट ऊँची भव्य पद्मासन मूर्ति दूर से ही दिखाई देती है।

महाराष्ट्र के वेरुल (एलोरा) में स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में अंतिम है। यह विश्वविख्यात यूनेस्को एलोरा गुफाओं (कैलाश मंदिर) के बिल्कुल समीप स्थित है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित इसका 5 मंजिला लाल पाषाण शिखर अनुपम है।
राजस्थान के सीकर जिले में स्थित श्री खाटू श्याम जी मंदिर कलयुग का साक्षात वैकुंठ माना जाता है। महाभारत काल में घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को अपना शीश दान किया था। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने नाम "श्याम" से कलयुग में पूजे जाने का वरदान दिया।

राजस्थान के चूरू जिले में स्थित श्री सालासर बालाजी मंदिर पूरे विश्व में अद्वितीय है क्योंकि यहाँ हनुमान जी दाढ़ी और मूंछों वाले स्वरूप में दर्शन देते हैं। यहाँ नारियल बांधकर मनोकामना मांगने और सवामणी (50 किलो चूरमा भोग) लगाने की अटूट परंपरा है।

गुजरात और राजस्थान की सीमा पर अरावली पर्वतमाला में स्थित माँ अम्बाजी 51 शक्तिपीठों में अत्यंत पावन है क्योंकि यहाँ माता सती का "हृदय" गिरा था। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि स्वर्ण जड़ित "श्री वीसा यंत्र" की गुप्त पूजा होती है जिसे नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता।
माँ सती के दाहिने पैर की अंगुलियां यहाँ आदि गंगा तट पर गिरी थीं। यहाँ माँ कालिका का विग्रह स्वर्ण जिह्वा और तीन विशाल नेत्रों से सुशोभित है।
यहाँ पाषाण से निरंतर प्रज्वलित 9 दिव्य ज्योतियों की पूजा होती है। मंदिर प्रांगण का 'सेज भवन' विश्वप्रसिद्ध है जहाँ रात्रि में माँ का चांदी का पलंग 16 श्रृंगार से सजता है, सौंदर्य लहरी का गान होता है और चौपड़ बिछाई जाती है।

यहाँ माँ सती का तीसरा नेत्र गिरा था। महर्षि वशिष्ठ और परमहंस साधक बामाखेपा की यह तपोभूमि है, जहाँ माँ तारा अपने भक्तों के समस्त भय व रोग हर लेती हैं।
विश्व का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर परिसर (156 एकड़)। यहाँ भगवान विष्णु आदि शेष पर क्षीरसागर में योगनिद्रा मुद्रा में विराजमान हैं।
कंस के कारागार का वह पावन गर्भगृह जहाँ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ था।

काशी विश्वनाथ के समीप मीर घाट पर स्थित। यहाँ माँ सती के कान के कुंडल गिरे थे। दक्षिण भारत के कांची कामाक्षी, मदुरै मीनाक्षी और काशी विशालाक्षी को त्रि-शक्तिपीठ माना जाता है।

कांचीपुरम के केंद्र में स्थित यह माँ कामाक्षी का मुख्य पीठ है। यहाँ आदि शंकराचार्य जी ने माँ के सम्मुख स्वर्ण श्री चक्र प्रतिष्ठापित किया था।
शंखिनी और डंकिनी नदियों के पावन संगम पर स्थित। यहाँ माँ सती के दांत गिरे थे। बस्तर दशहरा में माँ दंतेश्वरी की पालकी का उत्सव विश्व प्रसिद्ध है।
महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में प्रथम। यहाँ वर्ष में दो बार सूर्य की किरणें सीधे माँ महालक्ष्मी के चरणों और मुख को स्पर्श करती हैं (किरणोत्सव)।

नकारात्मक ऊर्जा, तंत्र-बाधा और असाध्य कष्टों के निवारण हेतु भारत का सबसे सिद्ध धाम। यहाँ बालाजी, प्रेतराज सरकार और कोतवाल भैरव जी त्रिमूर्ति रूप में विराजमान हैं।

पंपा नदी के पार घने जंगलों में स्थित। 41 दिनों के कठोर ब्रह्मचर्य व्रत (मंडलम) और "इरुमुडी" धारण करने के पश्चात ही 18 पावन सीढ़ियां चढ़कर दर्शन होते हैं।
कांचीपुरम के "विष्णु कांची" भाग में स्थित। यहाँ हर 40 वर्ष में एक बार अनंत सरोवर से "अथि वरदर" (गूलर की लकड़ी की मूर्ति) 48 दिनों के लिए बाहर निकालकर दर्शन कराए जाते हैं।
पटना जंक्शन के सामने स्थित। भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ संकटमोचन हनुमान जी की दो मूर्तियां एक साथ स्थापित हैं—एक साधुओं के परित्राण हेतु और दूसरी दुष्टों के संहार हेतु।
मैहर का अर्थ है "माई का हार"। यहाँ सती के गले का हार गिरा था। मान्यता है कि आज भी प्रातः मंदिर के कपाट खुलने से पूर्व अमर वीर आल्हा यहाँ प्रथम पूजा कर जाते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर के समीप रुद्रसागर तट पर स्थित। यहाँ सती की बाईं कोहनी गिरी थी। प्रांगण में स्थित 51 फीट ऊँचे दो दीपस्तंभों पर 1011 दीपों की प्रज्ज्वलि का दृश्य अलौकिक होता है।

गंगा तट पर विंध्य पर्वत पर स्थित। श्रीमद्भागवत के अनुसार कंस के हाथ से छूटकर आकाश में प्रकट होने वाली योगमाया यहीं विंध्य पर्वत पर सदा के लिए निवास करने आईं।
भैरवी और दामोदर नदियों के संगम पर स्थित। यहाँ माँ छिन्नमस्तिका का विग्रह स्वयंभू पाषाण पर उत्कीर्ण है जहाँ माँ अपने कटे हुए मस्तक को हाथ में लिए अपनी सहचरियों को रक्तपान कराती हैं।

पूर्वोत्तर भारत का अत्यंत पावन शक्तिपीठ। यहाँ माँ सती का दायां पैर गिरा था। मंदिर एक कछुए के आकार के टीले (कूर्मापृष्ठ) पर स्थित है।
हिंगलाज माता 51 शक्तिपीठों में अत्यंत पावन प्रथम पीठ माना जाता है जहाँ माता सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था। मकरान मरुस्थल में हिंगोल नदी के पावन तट पर स्थित यह प्राकृतिक गुफा तीर्थ चमत्कारों से परिपूर्ण है।
अमरनाथ धाम में हिमलिंग के सानिध्य में ही माता सती का पावन कंठ गिरा था। यहाँ माता महामाया रूप में और भगवान शिव त्रिसंध्येश्वर भैरव रूप में वास करते हैं।

प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित यह मंदिर अद्वितीय है क्योंकि यहाँ माता की कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक सजे हुए झूले (पालकी) की पूजा होती है जहाँ माता का अंग अलोप (अदृश्य) हुआ था।
वृंदावन में रंगजी मंदिर के निकट स्थित श्री कात्यायनी पीठ ब्रजभूमि का एकमात्र शक्तिपीठ है। द्वापर युग में गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यहीं कात्यायनी व्रत रखा था।

तीर्थराज पुष्कर में जहाँ ब्रह्मा जी का एकमात्र प्रसिद्ध मंदिर है, वहीं नाग पर्वत की तलहटी में माता सती के मणिबंध गिरने से मणिवेदिका गायत्री शक्तिपीठ प्रतिष्ठित हुआ।
बीरभूम जिले के बोलपुर में कोपाई नदी के शांत तट पर स्थित कंकालीतला शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की कमर की अस्थियां (कंकाल) गिरी थीं।
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ है जहाँ माता सती का दाहिना टखना गिरा था।

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में शिवालिक पर्वत की चोटी पर स्थित श्री नैना देवी जी मंदिर वह परम पावन शक्तिपीठ है जहाँ माता सती के दोनों नेत्र गिरे थे।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित माँ चिंतपूर्णी धाम वह पावन शक्तिपीठ है जहाँ माता सती के पावन चरण कमल गिरे थे। माँ अपने भक्तों की सभी चिंताओं को हरकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

सहारनपुर के बेहट क्षेत्र में शिवालिक की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित श्री शाकंभरी देवी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता ने भयंकर अकाल के समय अपने शरीर से शाक-भाजी और फल उत्पन्न कर संसार की रक्षा की थी।

ओडिशा के प्राचीन जाजपुर में वैतरणी नदी के तट पर स्थित विरजा मंदिर वह सिद्ध शक्तिपीठ है जहाँ माता सती का नाभि भाग गिरा था। यहाँ माता अद्वितीय द्विभुजी महिषमर्दिनी रूप में विराजित हैं।
भारत के दक्षिणी छोर पर तीनों महासागरों के पावन संगम पर स्थित कन्याकुमारी अम्मन मंदिर वह दिव्य शक्तिपीठ है जहाँ माता सती की पीठ (पृष्ठ भाग) गिरी थी। यहाँ माता बाल तपस्विनी कन्या के रूप में विराजित हैं।
कन्याकुमारी के निकट स्थित शुचींद्रम शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के ऊपर के दाँत गिरे थे। यहाँ त्रिमूर्ति (स्थानु-मल-अयन: शिव, विष्णु, ब्रह्मा) एक ही लिंग स्वरूप में पूजे जाते हैं।
महाराष्ट्र के नासिक जिले के वाणी में सह्याद्रि के सात पर्वत शिखरों से घिरे पर्वत पर स्थित श्री सप्तशृंगी देवी मंदिर वह पावन शक्तिपीठ है जहाँ माता सती की दाहिनी भुजा गिरी थी। यहाँ माता की 8 फीट ऊंची अठारह भुजाओं वाली पावन प्रतिमा है।
आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में पावन गोदावरी नदी के तट पर कोटेश्वर मंदिर के समीप स्थित यह शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के दोनों कपोल (गाल) गिरे थे। यहाँ माता विश्वेश्वरी और भगवान शिव दण्डपाणि भैरव रूप में पूजे जाते हैं।
मिथिलांचल के मधुबनी जिले के उच्चैठ गांव में स्थित यह शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का बायां कंधा गिरा था। यहीं मूर्ख कालिदास ने माता की सेवा कर महाकवि बनने का दिव्य वरदान प्राप्त किया था।
ऐतिहासिक पाटलिपुत्र (पटना) के महाराजगंज में स्थित बड़ी पटन देवी मंदिर वह पावन शक्तिपीठ है जहाँ माता सती की दाहिनी जांघ गिरी थी। इसी देवी के नाम पर इस प्राचीन नगर का नाम "पटना" पड़ा।
प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के पावन प्रभास क्षेत्र में त्रिवेणी संगम के समीप स्थित चंद्रभागा शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का उदर (पेट) गिरा था। यहाँ माँ चंद्रभागा और भगवान शिव वक्रतुंड भैरव रूप में वास करते हैं।

महाराष्ट्र के धाराशिव (उस्मानाबाद) जिले के यमुनाचल पर्वत पर स्थित माँ तुलजा भवानी मंदिर महाराष्ट्र की साढ़े तीन शक्तिपीठों में प्रमुख पीठ है। छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलस्वामिनी माँ भवानी ने ही उन्हें धर्मरक्षा हेतु प्रसिद्ध "भवानी तलवार" प्रदान की थी।
नेपाल की राजधानी काठमांडू में पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर से मात्र 1 किमी की दूरी पर बागमती नदी के तट पर स्थित गुह्येश्वरी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के दोनों घुटने गिरे थे।
नेपाल के हिमालयी मुस्तांग क्षेत्र में 3,710 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मुक्तिनाथ धाम वह अद्वितीय शक्तिपीठ है जहाँ माता सती का गंडस्थल (मस्तक) गिरा था। यह विश्व का एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहाँ भगवान विष्णु का शालिग्राम स्वरूप और सती का शक्तिपीठ एक साथ स्थित हैं।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित बक्रेश्वर शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के दोनों भौंहों के बीच का भाग (भ्रू-मध्य / आज्ञा चक्र) गिरा था। यह स्थान अपने सात चमत्कारी प्राकृतिक गर्म जल कुंडों (Hot Sulphur Springs) के लिए विख्यात है।
बीरभूम जिले के नलहाटी में एक छोटी पहाड़ी पर स्थित श्री नलाटेश्वरी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की कंठ नली (नला / श्वास नली) गिरी थी।

बीरभूम जिले के लाभपुर के निकट स्थित अट्टहास शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का निचला होंठ (अधर) गिरा था। देवी का नाम "फुल्लरा" है जिसका अर्थ है खिली हुई मुस्कान।

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के व्यापारिक नगर सेंथिया में मयूराक्षी नदी के तट पर स्थित श्री नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का दिव्य कंठहार (हार) गिरा था।
पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक मुर्शिदाबाद जिले के किरीटकोना गांव में स्थित किरीटेश्वरी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का मुकुट (किरीट) गिरा था। इसे भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में "सर्वश्रेष्ठ पर्यटन ग्राम" का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्धमान जिले के केतुग्राम में अजय नदी के तट पर स्थित बहुला शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की बायीं भुजा गिरी थी। यहाँ माता "बहुला" (समृद्धि व ऐश्वर्यदायिनी) रूप में पूजी जाती हैं।
उत्तरी पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र में तीस्ता (त्रिस्रोता) नदी के पावन तट पर स्थित यह शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती का बायाँ पैर (वाम पाद) गिरा था। यहाँ माता भ्रामरी रूप में और भगवान शिव ईश्वर भैरव रूप में वास करते हैं।

पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्धमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित माँ युगाद्या शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यह एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक पीठ है जहाँ माता की मूल मूर्ति वर्ष भर पवित्र क्षीर सरोवर के जल में जलमग्न रहती है और केवल वैशाख संक्रांति को बाहर निकाली जाती है।
भगवान शिव के साक्षात निवास पवित्र कैलाश पर्वत की तलहटी में 4,590 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर झील वह परम पावन शक्तिपीठ है जहाँ माता सती का दायाँ वक्ष (स्तन भाग) गिरा था। यहाँ माता "दाक्षायणी" और भगवान शिव "अमर भैरव" रूप में वास करते हैं।
बांग्लादेश के बरिशाल जिले के शिकारपुर गांव में सुगंधा नदी के तट पर स्थित यह शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की नासिका (नाक) गिरी थी। यहाँ माता "सुनंदा" और भगवान शिव "त्र्यंबक" भैरव रूप में पूजे जाते हैं।
बांग्लादेश के चटगांव जिले के सीताकुंड में 1,155 फीट ऊंचे चंद्रनाथ पर्वत के शिखर पर स्थित चट्टल शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की दाहिनी भुजा गिरी थी। यहाँ माता "भवानी" और भगवान शिव "चंद्रशेखर" भैरव रूप में वास करते हैं।
बांग्लादेश के सातखीरा जिले के ईश्वरीपुर में सुंदरवन के मुहाने पर स्थित यशोरेश्वरी शक्तिपीठ वह पावन स्थल है जहाँ माता सती के हाथ और पैर (हस्तपद्म) गिरे थे। मार्च 2021 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहाँ दर्शन कर माता को स्वर्ण मुकुट अर्पित किया था।
तमिलनाडु के मंदिरों के नगर कुंभकोणम में स्थित श्री सारंगपाणि मंदिर 108 दिव्य देशमों में श्रीरंगम और तिरुपति के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण पावन धाम है। यहाँ भगवान विष्णु सारंग (दिव्य धनुष) धारण किए हुए कोमल पद्मासन व उत्थान शयन मुद्रा में विराजित हैं।
श्रीविल्लिपुत्तूर वह परम पावन दिव्य देशम है जहाँ एकमात्र महिला आलवार संत माता आण्डाल (गोदा देवी) का प्राकट्य तुलसी के क्यारे में हुआ था। मंदिर का 192 फीट ऊंचा 11-तलीय गोपुरम तमिलनाडु सरकार का आधिकारिक राज्य प्रतीक (State Emblem) है।
आंध्र प्रदेश के नल्लामाला वनों में स्थित अहोलबिलम वह परम पावन दिव्य देशम है जहाँ भगवान नरसिंह खंभे को चीरकर प्रकट हुए थे और दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध कर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। यहाँ 9 अलग-अलग पर्वत शिखरों पर भगवान नरसिंह के 9 स्वयंभू स्वरूप (नव नरसिंह) पूजे जाते हैं।
चेन्नई के समीप तिरुवल्लूर में स्थित श्री वीरराघव स्वामी मंदिर 108 दिव्य देशमों में आरोग्य और रोग-मुक्ति का सबसे सिद्ध धाम है। यहाँ भगवान भुजंग शयन (शेषनाग पर विश्राम) मुद्रा में हैं और उन्हें "वैद्य वीरराघव" कहा जाता है जो सभी असाध्य रोगों को हर लेते हैं।
कर्नाटक के तटीय नगर उडुपी में स्थित श्री कृष्ण मठ विश्व विख्यात वैष्णव महातीर्थ है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन सीधे न होकर चांदी की नौ छिद्रों वाली पावन खिड़की "कनकन किंडी" (Kanakana Kindi) से किए जाते हैं, जिसे भगवान ने अपने अनन्य भक्त कनकदास के लिए स्वयं पश्चिम दिशा की ओर घूमकर खोला था।
केरल के वरकला में अरब सागर की लाल चट्टानों (पापनाशम तट) पर स्थित श्री जनार्दन स्वामी मंदिर "दक्षिण काशी" के रूप में पूजित परम पावन वैष्णव धाम है। यहाँ भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में विराजित हैं और उनके हाथ में अमृत कुंभ (अमृत का पात्र) है।
मदुरै से 21 किमी उत्तर में हरी-भरी अझगर पहाड़ियों की तलहटी में स्थित कल्लाझगर मंदिर 108 दिव्य देशमों में अत्यंत रमणीय धाम है। यहाँ भगवान विष्णु "सुंदरराजन" (अति सुंदर स्वामी) रूप में विराजित हैं, जिन्हें माता मीनाक्षी का सगा भाई माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य तीर्थ 108 दिव्य देशमों में उत्तर भारत का अत्यंत पूज्य धाम है। यह वही परम पवित्र तपोभूमि है जहाँ 88,000 ऋषियों ने शौनक जी के नेतृत्व में 1000 वर्षों का महासत्र यज्ञ किया था और सूत जी ने अठारह पुराणों की कथा सुनाई थी।

केरल के त्रिशूर जिले में स्थित गुरुवायूर श्री कृष्ण मंदिर को "भूलोक वैकुंठ" (पृथ्वी पर वैकुंठ) कहा जाता है। यहाँ स्थापित अत्यंत दुर्लभ पाताल अंजन शिला (पाषाण) का चतुर्भुज विग्रह द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका में पूजित था।

चेन्नई के ऐतिहासिक त्रिपलीकेन (तिरुवल्लिकेणी) में मरीना बीच के समीप स्थित श्री पार्थसारथी मंदिर 108 दिव्य देशमों में अद्वितीय है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी "पार्थसारथी" के रूप में विराजित हैं, जिनके चेहरे पर मूंछें हैं और पूरे शरीर पर महाभारत युद्ध में भीष्म आदि के बाणों के घावों के पावन निशान अंकित हैं।

राजस्थान के अरावली अंचल में बनास नदी के तट पर स्थित श्रीनाथजी मंदिर पुष्टिमार्ग वैष्णव परंपरा का सर्वोच्च धाम (हवेली) है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के 7 वर्ष के बाल स्वरूप का विग्रह प्रतिष्ठित है जिसमें उनका बायाँ हाथ गोवर्धन पर्वत को उठाए हुए और दायाँ हाथ कमर पर टिका हुआ है।
हर मंदिर के कड़े प्रवेश नियम—धोती, साड़ी, स्पर्श दर्शन, मोबाइल लॉकर व वर्जित वस्तुओं की पूरी जानकारी।
मंगला, भोग, संध्या, शयन आरती और वीआईपी शीघ्र दर्शन पास की विश्वसनीय और अद्यतन समय-सारणी।
निकटतम रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, बस सेवा एवं आस-पास के अन्य दर्शनीय तीर्थों की संपूर्ण सूची।