
8वीं सदी का पल्लव स्थापत्य · गीता उपदेशक मूंछों वाले पार्थसारथी श्रीकृष्ण
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भावार्थ: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना हेतु मैं अवतार लेता हूँ।
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में भगवान ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, अतः उनके हाथ में सुदर्शन चक्र न होकर केवल शंख (पांचजन्य) है और वे अपने रथ के पहिए के चाबुक को संभाले हुए हैं।
यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान विष्णु के 5 अलग-अलग अवतार—कृष्ण (पार्थसारथी), राम, नरसिंह, रंगनाथ और वरदराज एक ही परिसर में पूजे जाते हैं। पय्याल्वार, तिरुमझिसै और तिरुमंगै आलवार ने इसके गुणगान में 31 पाशुरम रचे हैं।
9 फीट ऊंचा विशाल प्रस्तर विग्रह जिसमें श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी, भ्राता बलराम, पुत्र प्रद्युम्न, पौत्र अनिरुद्ध और सात्यकि पूरे परिवार सहित एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| विश्वरूप सेवा | प्रातः 05:45 | सुप्रभातम् व शुद्ध घी भोग |
| सायं दीप आराधना | सायं 07:00 | शंखनाद व गीता श्लोक पाठ |
धोती अनिवार्य (शर्ट उतारना नियम)
साड़ी या सलवार सूट
💡 कैरविणी सरोवर की पवित्रता का ध्यान रखें।
10 दिवसीय विशाल रथ परिक्रमा व गरुड़ सेवा
स्वर्ग द्वार से महाविष्णु का भव्य प्राकट्य
चेन्नई एयरपोर्ट से कैब या मेट्रो द्वारा 35 मिनट में मंदिर पहुंचा जा सकता है।
चेन्नई सेंट्रल या एग्मोर रेलवे स्टेशन से ऑटो/टैक्सी द्वारा मात्र 15 मिनट।
कामराजार सलाई (मरीना बीच रोड) और अन्ना सलाई से सभी बसें त्रिपलीकेन आती हैं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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