
“मोक्ष प्रदायक, समस्त पाप नाशक एवं भगवान श्रीहरि विष्णु का सर्वप्रिय पावन एकादशी अनुष्ठान”
पद्म पुराण में वेदव्यास जी कहते हैं—"न गंगासदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः। न ह्येकादशीसमं किञ्चित् पावनं विद्यते भुवि॥" अर्थात् गंगा जैसा कोई तीर्थ नहीं, विष्णु जैसा कोई देव नहीं, और एकादशी जैसा कोई पावन व्रत पृथ्वी पर नहीं है। यह व्रत शरीर को डिटॉक्स (शुद्ध) करता है और जीवात्मा को परमात्म चेतना से जोड़ता है।
बुजुर्गों के लिए यह मोक्ष और हरि भक्ति का साधन है, जबकि युवा पीढ़ी के लिए यह मानसिक शांति, आत्मसंयम और शारीरिक स्वास्थ्य (इंटरमिटेंट फास्टिंग का आध्यात्मिक स्वरूप) प्रदान करने वाला अनुपम अनुशासन है।
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घर पर स्वयं करने हेतु सरल एवं प्रमाणिक विधि
सूर्योदय से पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में उठें। गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और तिल लेकर भगवान विष्णु के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
सरल अर्थ: हे पुण्डरीकाक्ष! मैं एकादशी को निराहार रहकर द्वादशी को पारण करूँगा। हे अच्युत! आप मेरी शरण बनें और मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण कराएं।
तांबे या पीतल की थाली में भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा शालिग्राम जी को स्थापित करें। दक्षिणावर्ती शंख में कच्चा गाय का दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल भरकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र बोलते हुए अभिषेक कराएं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ विष्णवे नमः। ॐ नारायणाय नमः॥
सरल अर्थ: समस्त ब्रह्माण्ड में वास करने वाले परमपिता भगवान वासुदेव को मेरा बारम्बार नमन।
भगवान को पीताम्बर (पीले वस्त्र) पहनाएं। माथे पर गोपी चन्दन या केसर चन्दन का तिलक लगाएं। इसके पश्चात 21 तुलसी दलों पर चन्दन लगाकर एक-एक कर श्रीहरि के श्रीचरणों में और कंठ में अर्पित करें।
तुलसी विष्णुपत्नी त्वं क्षीरोदार्णवसंभवे। गोविन्दवल्लभे देवि भक्त्या दत्तां गृहाण मे॥
सरल अर्थ: क्षीरसागर से प्रकट हुई हे तुलसी देवी! आप भगवान गोविन्द को अत्यंत प्रिय हैं, मेरी भक्तिपूर्वक दी गई यह सेवा स्वीकार करें।
गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। पीले फल, पंचमेवा और मखाने की खीर का भोग लगाएं। प्रत्येक पात्र में एक-एक तुलसी पत्र अवश्य रखें।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ सत्यं त्वर्तेन परिषिश्चामि। अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥
सरल अर्थ: हे सर्वशक्तिमान परमात्मा! यह शुद्ध फलाहारी नैवेद्य आपको सादर समर्पित है।
शांत भाव से बैठकर श्री विष्णु सहस्रनाम के 1000 नामों का पाठ करें अथवा श्रवण करें। उस विशिष्ट एकादशी (जैसे कामदा, निर्जला, मोक्षदा आदि) की पावन कथा का श्रवण करें।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
सरल अर्थ: शांत स्वरूप वाले, शेषनाग पर शयन करने वाले, कमलनाभ, देवों के देव, संसार के आधार, मेघवर्ण वाले, कमलनयन भगवान विष्णु को मैं नमन करता हूँ।
सायंकाल पुनः घी का दीपक जलाकर "ॐ जय जगदीश हरे" आरती गाएं। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। अगले दिन (द्वादशी) को सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न-वस्त्र दान देकर शुभ पारण मुहूर्त में ही व्रत खोलें।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
सरल अर्थ: हे जगत के स्वामी भगवान जगदीश! आपकी जय हो। अपने भक्तों के समस्त संकटों को आप क्षणभर में दूर करते हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सर्वव्यापक परमात्मा भगवान वासुदेव को मेरा बारम्बार प्रणाम।
लाभ: इस मंत्र का 108 बार तुलसी की माला से जप करने से सभी प्रकार के पापों और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
एकादश्यामुपोषित्वा द्वादश्यां परतोऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
अर्थ: हे अच्युत! एकादशी व्रत पूर्ण कर अब मैं द्वादशी को अन्न ग्रहण कर रहा हूँ, मुझ पर कृपा दृष्टि बनाए रखें।
लाभ: व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और पारण दोष नहीं लगता।
कुल 8 वस्तुएं
काशी एवं हरिद्वार के प्रामाणिक ब्राह्मणों द्वारा ऑनलाइन अथवा घर पर आकर शास्त्रसम्मत पूजन संपन्न कराया जाएगा।
पंडित सेवा बुक करेंनिर्जला, देवशयनी, देवउठनी, कामदा, मोक्षदा जैसी समस्त 24 एकादशियों पर फलाहार, विष्णु सहस्रनाम पाठ और द्वादशी पारण की शास्त्रसम्मत विधि।
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