
प्रत्येक त्योहार की सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और पंडित सेवा — सब एक ही पावन मंच पर। हमारी और आने वाली पीढ़ियों के लिए सनातन संस्कृति का संपूर्ण दिग्दर्शन।
कुल 30 पर्व उपलब्ध हैं

सनातन धर्म का सर्वाधिक भव्य प्रकाशपर्व, जिसमें माँ महालक्ष्मी और बुद्धिदाता श्री गणेश का विधिवत पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

माँ दुर्गा के शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक के नौ पावन रूपों की उपासना, दुर्गा सप्तशती पाठ और कन्या पूजन का महापर्व।

शिव-शक्ति के एकाकार होने की परम पावन तिथि। इस दिन चारों प्रहर का रुद्राभिषेक समस्त पापों का शमन कर मोक्ष प्रदान करता है।
घर-घर में गणपति बप्पा की मिट्टी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, 21 मोदक व दूर्वा अर्पण और मंगल आरती का आनंदमय पर्व।

नए वाहन की खरीद पर अथवा प्रत्येक दशहरे/दीपावली पर वाहन पर स्वास्तिक, नींबू-मिर्च, नारियल फोड़कर और हनुमान जी के सिंदूर से रक्षा सूत्र बांधने की विधि।

कारखानों, दुकानों, वाहनों, कम्प्यूटर, औजारों और इंजीनियरिंग उपकरणों की शुद्धि, पूजन और कार्यकुशलता की वृद्धि हेतु विशेष अनुष्ठान।

निर्जला, देवशयनी, देवउठनी, कामदा, मोक्षदा जैसी समस्त 24 एकादशियों पर फलाहार, विष्णु सहस्रनाम पाठ और द्वादशी पारण की शास्त्रसम्मत विधि।
नए घर में दाहिना पैर पहले रखकर प्रवेश, मंगल कलश यात्रा, वास्तु शांति, नवग्रह हवन और गौ-माता के पूजन की संपूर्ण शास्त्रीय पद्धति।

अमृत कलश लेकर अवतरित हुए आयुर्वेद प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरि का पूजन, पीतल/सोना/चांदी के पात्रों की खरीद और यम दीपदान।

सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत, मिट्टी के करवे से चौथ माता का पूजन, करवा चौथ कथा श्रवण और छलनी से पति व चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देने की विधि।

नहाय-खाय, खरना, अस्ताचलगामी सूर्य को संध्या अर्घ्य और उदीयमान सूर्य को प्रातः अर्घ्य के साथ सम्पन्न होने वाला स्वच्छता और पवित्रता का सर्वोच्च पर्व।

अभिजीत मुहूर्त में मध्याह्न 12 बजे प्रभु श्री राम का जन्मोत्सव, रामायण पाठ, पंचामृत अभिषेक और राम स्तुति का पावन पर्व।

मध्यरात्रि 12 बजे खीरे की नाल काटकर लड्डू गोपाल का प्राकट्य, शंख में पंचामृत भरकर अभिषेक, झूला झुलाना और धनिया पंजीरी भोग।

पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य को तांबे के पात्र से अर्घ्य, तिल-गुड़ का सेवन व दान और पतंग उत्सव का आनंद।

पीले वस्त्र धारण कर माँ शारदा का श्वेत व पीले पुष्पों से पूजन, बच्चों का अक्षराम्भ (विद्यारम्भ) संस्कार और पुस्तकों का अर्चन।

चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाना, लाल लंगोट, बूंदी के लड्डू अर्पण और 100 बार हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का सामूहिक पाठ।
सनातन परंपरा व उत्तर भारत का पावन पर्व, जिसमें पवित्र अग्नि देव को तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, दीर्घायु एवं नवजात शिशु व नवविवाहितों के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

सनातन का अति पावन वसंतोत्सव, जिसमें फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन कर अहंकार, राग-द्वेष और बुराइयों को भस्म किया जाता है और अगले दिन प्राकृतिक रंगों व अबीर-गुलाल से श्री राधा-कृष्ण का रंगोत्सव मनाया जाता है।
सनातन का अति पावन पर्व जिसमें बहनें अपने भाई की कलाई पर वैदिक रक्षासूत्र बांधकर उसकी दीर्घायु व समृद्धि की कामना करती हैं और भाई जीवनभर रक्षा का संकल्प लेता है।
सनातन संस्कृति का परम विजय पर्व, जब भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की थी और माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। इस दिन शस्त्र, वाहन एवं शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है।
दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला महापर्व, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र के अहंकार का मर्दन कर गिरिराज पर्वत को कनिष्ठिका उंगली पर उठाने की स्मृति में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर 56 प्रकार के सात्विक भोग अर्पित किए जाते हैं।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया का पावन पर्व, जिसमें बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर, गोला (सूखा नारियल) भेंट कर उनकी दीर्घायु, स्वास्थ्य और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना करती हैं।

समस्त ज्ञान के मूल महर्षि वेदव्यास जी के प्राकट्य दिवस पर अपने आध्यात्मिक सद्गुरु, माता-पिता और ज्ञानदाताओं का पावन चरण पूजन कर उनके प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करने का महापर्व।

सनातन का वह पावन स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त, जिसमें किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान, जप और तप कभी क्षय नहीं होता। इस दिन स्वर्ण क्रय, नया व्यापार प्रारंभ और अन्न-जल का दान महाफलदायी माना जाता है।
भगवान विष्णु के चार मास की योगनिद्रा से जागने के पश्चात शालिग्राम रूप में माता तुलसी के साथ वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह का पावन महोत्सव, जिसके साथ ही समस्त शुभ मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।

सनातन विक्रम संवत नववर्ष के प्रथम दिन से प्रारंभ होने वाला वासंती नवरात्र, जिसमें माँ शैलपुत्री से माँ सिद्धिदात्री तक नौ देवियों की आराधना कर नवमी तिथि पर भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर काशी के समस्त गंगा घाटों पर लाखों मिट्टी के दीप जलाकर मनाया जाने वाला अलौकिक महापर्व। मान्यता है कि इस दिन स्वयं देवता स्वर्ग से उतरकर गंगा तट पर दीपावली मनाते हैं।

आश्विन पूर्णिमा की वह पावन निशा जब चंद्रमा अपनी समस्त 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। इस रात्रि माँ लक्ष्मी भूलोक पर विचरण कर पूछती हैं "को जागर्ति" (कौन जाग रहा है) और जागरण करने वाले साधकों को असीम ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।

सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं द्वारा रखा जाने वाला अत्यंत कठिन निर्जला व्रत, जिसमें बालू या काली मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाकर 16 श्रृंगार के साथ पूजन किया जाता है।

श्रावण शुक्ल पंचमी का पावन दिवस, जब भगवान शिव के कंठहार नाग देवता और पाताल के अष्टनागों की पूजा कर दूध, दूर्वा और लावा अर्पित किया जाता है, जिससे परिवार की सर्पभय से रक्षा होती है।
निर्जला, देवशयनी, देवउठनी, कामदा, मोक्षदा जैसी समस्त एकादशियों की शास्त्रसम्मत जानकारी और भगवान श्रीहरि की आराधना विधि।