“भाई-बहन के अटूट स्नेह, रक्षासूत्र, उपनयन संस्कार और वैदिक मर्यादाओं का पावन पर्व”
सनातन का अति पावन पर्व जिसमें बहनें अपने भाई की कलाई पर वैदिक रक्षासूत्र बांधकर उसकी दीर्घायु व समृद्धि की कामना करती हैं और भाई जीवनभर रक्षा का संकल्प लेता है।
भविष्य पुराण के अनुसार देवराज इंद्र को असुरों पर विजय दिलाने हेतु इंद्राणी शची ने रक्षासूत्र बांधा था। महाभारत में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहने पर अपनी साड़ी का पल्लू बांधा था, जिसकी लाज भगवान ने चीरहरण के समय रखी थी। इस दिन ब्राह्मणों द्वारा यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलने का श्रावणी उपाकर्म भी होता है।
दानवेन्द्र राजा बलि ने जब भगवान वामन को पाताल लोक में अपने साथ रहने का वचन ले लिया, तब माँ लक्ष्मी ने बलि को रक्षासूत्र बांधकर भाई बनाया और उपहार में भगवान विष्णु को मांग लिया। बलि ने सहर्ष अपने वचनानुसार श्रीहरि को विदा किया।
प्रातःकाल स्नानादि कर पूजा की थाली में कुमकुम, अक्षत, दीपक, मिठाई और रक्षासूत्र सजाना
सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश और कुलदेवता को रक्षासूत्र समर्पित करना
भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाना और सिर पर रुमाल या टोपी रखना
दाहिने हाथ की कलाई पर "येन बद्धो बली राजा..." वैदिक मंत्र का उच्चारण करते हुए रक्षासूत्र बांधना
भाई की आरती उतारना, मिष्ठान्न खिलाना और भाई द्वारा बहन को मंगल उपहार व रक्षा का वचन देना
रक्षाबंधन पर भद्रा काल का विशेष विचार किया जाता है। भद्रा समाप्त होने के उपरांत ही शुभ चौघड़िया में राखी बांधना कल्याणकारी है।
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