
“अज्ञान के अंधकार को हरने वाले दिव्य गुरु चरणों में सर्वस्व समर्पण एवं ज्ञान का महापर्व”
समस्त ज्ञान के मूल महर्षि वेदव्यास जी के प्राकट्य दिवस पर अपने आध्यात्मिक सद्गुरु, माता-पिता और ज्ञानदाताओं का पावन चरण पूजन कर उनके प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करने का महापर्व।
"गु" का अर्थ है अंधकार और "रु" का अर्थ है प्रकाश। जो अज्ञान के तिमिर से निकालकर परब्रह्म परमात्मा के ज्ञान के आलोक में ले जाएं, वही सद्गुरु हैं। सनातन परंपरा में गुरु को साक्षात परब्रह्म का स्वरूप माना गया है।
महर्षि पाराशर और माता सत्यवती के पावन पुत्र महर्षि वेदव्यास जी ने इस दिन जन्म लिया था। उन्होंने मानव कल्याण हेतु ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में वेदों का विभाजन किया तथा 18 महापुराणों, उपपुराणों, ब्रह्मसूत्र और महाभारत महाग्रंथ की रचना की। अतः इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
प्रातःकाल तीर्थ स्नान अथवा गंगाजल युक्त जल से स्नान
सद्गुरु की पादुका अथवा चित्र का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक व रोली-चंदन से पूजन
पीले पुष्प, पीताम्बरी वस्त्र, फल और गुरु दक्षिणा समर्पित करना
गुरु द्वारा दिए गए गुरुमंत्र की कम से कम 11 माला जप करना
गुरु की आरती उतारना और श्रीमद्भगवद्गीता अथवा गुरुगीता का पाठ करना
पूर्णिमा तिथि के प्रातःकाल में गुरु पादुका पूजन, गुरु मंत्र जप और गुरु दक्षिणा अर्पण सर्वोत्तम फलदायी होता है।
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