
“अखण्ड सौभाग्य, दांपत्य प्रेम और पति की दीर्घायु का पावन निर्जला व्रत”
सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत, मिट्टी के करवे से चौथ माता का पूजन, करवा चौथ कथा श्रवण और छलनी से पति व चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देने की विधि।
महाभारत में द्रौपदी ने पांडवों के संकट निवारण हेतु यह व्रत किया था। करवा माता ने अपने सतीत्व के बल पर यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले लिए थे।
रानी वीरवती ने भाइयों के स्नेहवश झूठे चंद्रमा को देखकर व्रत खोल दिया था, जिससे पति मूर्छित हो गए थे। पुनः नियमपूर्वक व्रत करने पर पति को नवजीवन मिला।
सूर्योदय पूर्व सास द्वारा दी गई सरगी का सात्विक सेवन
दिनभर निर्जला रहकर शिव परिवार व करवा माता का ध्यान
सायंकाल सोलह श्रृंगार कर सखियों के साथ करवा फेरना व कथा सुनना
चंद्रमा के उदय होने पर छलनी में दीपक रखकर चंद्र दर्शन व अर्घ्य
पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत पूर्ण करना और बड़ों का आशीर्वाद लेना
सायंकाल करवा चौथ माता की कथा सुनें और चंद्रोदय के समय कच्चे दूध मिश्रित जल से चंद्र देव को अर्घ्य दें।
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