“प्रकृति, गौमाता और गिरिराज जी के प्रति कृतज्ञता एवं 56 भोग अन्नकूट का पावन उत्सव”
दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला महापर्व, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र के अहंकार का मर्दन कर गिरिराज पर्वत को कनिष्ठिका उंगली पर उठाने की स्मृति में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर 56 प्रकार के सात्विक भोग अर्पित किए जाते हैं।
गोवर्धन पूजा सनातन धर्म का प्रत्यक्ष प्रकृति-संरक्षण पर्व है। भगवान कृष्ण ने सिखाया कि जो पर्वत, नदियां, वृक्ष और गौमाता हमें प्रत्यक्ष जीवन और अन्न प्रदान करती हैं, उनका पूजन ही सच्चा धर्म है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार ब्रजवासियों द्वारा देवराज इंद्र की पूजा की परंपरा को रोककर श्रीकृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन और गौमाता की पूजा आरंभ कराई। कुपित इंद्र ने प्रलयंकारी वर्षा की, तब कन्हैया ने सात दिनों तक सात कोस के गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण कर समस्त ब्रजवासियों और पशुओं की रक्षा की। अंततः इंद्र का मानमर्दन हुआ और उन्होंने कामधेनु सहित आकर श्रीकृष्ण का अभिषेक किया।
घर के आंगन में शुद्ध गाय के गोबर से गिरिराज गोवर्धन और गौ-ग्वाल का दिव्य स्वरूप बनाना
नाभि स्थान पर दीपक प्रज्वलित कर दूध, बताशा, गंगाजल, दही और नैवेद्य अर्पण
अन्नकूट के रूप में कढ़ी, चावल, बाजरा, खीर और विविध मौसमी सब्जियों का सात्विक 56 भोग
गौमाता और बछड़ों को स्नान कराकर रोली, हल्दी का लेप, फूलों की माला और गुड़-चारा खिलाना
परिवार सहित गोवर्धन जी की 7 बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा लगाना
प्रातःकाल अथवा सायंकाल प्रदोष वेला में गोवर्धन पूजन और अन्नकूट भोग लगाना शास्त्रसम्मत माना गया है।
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