“चार मास के योगनिद्रा के पश्चात श्रीहरि का जागरण एवं माता तुलसी संग दिव्य विवाह महोत्सव”
भगवान विष्णु के चार मास की योगनिद्रा से जागने के पश्चात शालिग्राम रूप में माता तुलसी के साथ वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह का पावन महोत्सव, जिसके साथ ही समस्त शुभ मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।
स्कंद पुराण एवं पद्म पुराण के अनुसार जिस घर में तुलसी विवाह विधिवत संपन्न कराया जाता है, उस परिवार को कन्यादान के समान अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन में सदैव सुख-शांति बनी रहती है।
जालंधर दैत्य की पतिव्रता पत्नी वृंदा के सतीत्व के बल पर जालंधर अजेय हो गया था। देवताओं की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रत खंडित किया। वृंदा ने देहत्याग करते हुए श्रीहरि को पाषाण (शालिग्राम) बनने का शाप दिया। पश्चाताप में भगवान ने वरदान दिया कि तुम तुलसी पौधे के रूप में मेरे साथ पूजी जाओगी और बिना तुलसी दल के मेरा कोई भी भोग स्वीकार नहीं होगा।
तुलसी जी के गमले के चारों ओर गन्ने का सुंदर विवाह मंडप सजाना
तुलसी जी को लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और 16 श्रृंगार अर्पित करना
भगवान शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराकर पीले वस्त्र और चंदन का लेप लगाना
शालिग्राम जी और तुलसी माता के बीच पीले वस्त्र का गठबंधन बांधना
मंगल विवाह गीत गाते हुए 7 बार परिक्रमा (फेरे) लगाना और खीर व बताशे का भोग लगाना
संध्या समय गोधूलि वेला में गन्ने का भव्य मंडप बनाकर तुलसी विवाह संपन्न कराना शास्त्रसम्मत व सर्वोत्तम माना गया है।
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