
“सर्पदोष एवं कालसर्प दोष निवारण हेतु अष्टनागों का पावन पूजन एवं दुग्धाभिषेक”
श्रावण शुक्ल पंचमी का पावन दिवस, जब भगवान शिव के कंठहार नाग देवता और पाताल के अष्टनागों की पूजा कर दूध, दूर्वा और लावा अर्पित किया जाता है, जिससे परिवार की सर्पभय से रक्षा होती है।
सनातन धर्म में जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति समभाव की शिक्षा दी जाती है। नाग देवता भगवान विष्णु की शय्या (शेषनाग) और महादेव के आभूषण (वासुकि) हैं। इस दिन पूजन से कुंडली के कालसर्प दोष की शांति होती है।
महाभारत के अनुसार राजा जनमेजय ने पिता परीक्षित की तक्षक द्वारा मृत्यु का बदला लेने हेतु सर्पमेध यज्ञ किया था। आस्तीक मुनि ने इसी पंचमी तिथि पर यज्ञ रोककर नाग कुल की रक्षा की थी। इसके अलावा भगवान कृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा भी प्रसिद्ध है।
घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गाय के गोबर या गेरू से नाग देवता की आकृति बनाना
नाग प्रतिमा पर कच्चा दूध, जल, रोली, अक्षत और दूर्वा अर्पित करना
भुने हुए चने, लावा (खील) और दूध का नैवेद्य चढ़ाना
"सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले..." मंत्र का पाठ
शिव मंदिर में शिवलिंग पर लिपटे नागदेव का अभिषेक
प्रातःकाल श्रावण पंचमी के शुभ मुहूर्त में नाग देवता का दुग्धाभिषेक मंगलकारी है।
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