51 शक्तिपीठों में पावन दंत पीठ · बस्तर की अधिष्ठात्री महादेवी
दन्तेश्वरी महामाये शंखिनीडंकिनीप्रिये। भक्तानुकम्पिनी देवी रक्ष मां शरणागतम्॥
भावार्थ: शंखिनी-डंकिनी के संगम पर विराजित, भक्तों पर दया करने वाली माँ दंतेश्वरी! शरणागत की रक्षा करें।
सती के दांत यहाँ गिरने से इसका नाम दंतेवाड़ा पड़ा। संगम का जल दो भिन्न रंगों (काला व सफेद) में बहता है जो इस स्थल की दिव्यता को दर्शाता है।
काकतीय राजवंश की कुलदेवी। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा पर्व माँ दंतेश्वरी को ही समर्पित होता है, जो विश्व का सबसे लंबा चलने वाला लोकपर्व है।
चार भागों में विभक्त मंदिर—गर्भगृह, महामंडप, मुख्य मंडप और सभा मंडप। गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पाषाण से निर्मित माँ की षड्भुजी दिव्य प्रतिमा है।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 06:00 - 06:30 | प्रातः आरती |
| भोग आरती | दोपहर 12:00 - 12:30 | महाभोग |
| संध्या आरती | सायं 06:30 - 07:15 | दीप आरती |
| शयन आरती | रात्रि 08:30 - 09:00 | शयन |
धोती-कुर्ता या सात्विक वस्त्र। गर्भगृह में धोती अनिवार्य।
साड़ी या सलवार-सूट।
💡 संगम स्नान के पश्चात दर्शन का विशेष विधान है।
माँ की भव्य पालकी व काष्ठ रथ यात्रा
अखंड मनोकामना ज्योति कलश
जगदलपुर एयरपोर्ट से टैक्सी द्वारा 1.5 घंटे में दंतेवाड़ा पहुँचा जा सकता है।
विशाखापट्टनम-किरंदुल रेलमार्ग पर दंतेवाड़ा स्टेशन सीधे जुड़ा है।
रायपुर, जगदलपुर और हैदराबाद से नियमित बस सेवाएं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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