
सती के दोनों नेत्र (आँखें) · माँ महिषमर्दिनी नैना देवी व कपाल भैरव · शिवालिक
नेत्रयोः पतिता देवी नैनादेवी प्रकीर्तिता। कपालभैरवो यत्र भक्तानामभयप्रदः॥
भावार्थ: सती के नेत्र गिरने से देवी नैना देवी कहलाईं, जहाँ कपाल भैरव भक्तों को अभय प्रदान करते हैं।
माता सती के दोनों नेत्र यहाँ गिरे जिससे देवी को "नैना देवी" कहा गया। इसी पर्वत पर माँ ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया था।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों के विरुद्ध धर्मयुद्ध प्रारंभ करने से पूर्व 1765 में यहीं चंडी महायज्ञ किया था। नैना गुज्जर नामक ग्वाले ने इस पावन स्थल की खोज की थी।
समुद्र तल से 3,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित भव्य मंदिर जहाँ से पावन गोबिंद सागर झील और भाखड़ा बांध का मनोरम दृश्य दिखता है।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 05:00 | नेत्र ज्योति दर्शन व प्रातः स्नान |
| दोपहर भोग आरती | दोपहर 12:00 | राजभोग अर्पण |
| शयन आरती | रात्रि 09:30 | रात्रि विश्राम आरती |
धोती-कुर्ता, पायजामा या शालीन वस्त्र
साड़ी या सलवार सूट
💡 रोपवे या सीढ़ियों पर कतारबद्ध होकर ही आगे बढ़ें।
लाखों श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब
अखंड ज्योति व शतचंडी महायज्ञ
चंडीगढ़ एयरपोर्ट से टैक्सी द्वारा 2.5 घंटे में नैना देवी जी पहुँचा जा सकता है।
आनंदपुर साहिब रेलवे स्टेशन से मात्र 30 से 40 मिनट में बस या टैक्सी द्वारा मंदिर पहुंचा जाता है।
चंडीगढ़, शिमला, बिलासपुर और ऊना से सीधी हिमाचल पथ परिवहन (HRTC) बसें उपलब्ध हैं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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