जगद्गुरु मध्वाचार्य द्वारा स्थापित · कनकन किंडी झरोखा दर्शन · अष्टमठ तीर्थ
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्। सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
भावार्थ: ललाट पर कस्तूरी तिलक, वक्ष पर कौस्तुभ मणि और हाथों में मुरली धारण करने वाले परम सुंदर गोपाल श्रीकृष्ण सदा विजयी हों।
भक्त कनकदास को जब निम्न जाति होने के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं मिला, तब वे बाहर बैठकर रोते हुए कीर्तन करने लगे। भगवान कृष्ण उनकी भक्ति से द्रवित होकर 180 डिग्री पश्चिम की ओर मुड़ गए और दीवार में दरार बनाकर उन्हें साक्षात दर्शन दिए।
जगद्गुरु मध्वाचार्य ने द्वारका से गोपचंदन शिला में लिपटे बालकृष्ण के विग्रह को मलबे के जहाज से प्राप्त कर यहाँ स्थापित किया था। यहाँ "अष्ट मठ" (8 मठ) हर 2 वर्ष में "पर्याय महोत्सव" द्वारा मंदिर की सेवा का दायित्व संभालते हैं।
सुवर्ण आच्छादित गोपुरम, पावन मध्व सरोवर, और चाँदी व सोने के भव्य रथ जो रात्रि में जगमगाते हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| निर्मल्य विसर्जन आरती | प्रातः 05:30 | प्रातः अभिषेक व चूर्णोत्सव |
| महापूजा व रथोत्सव | दोपहर 12:00 | स्वर्ण रथ पर बालकृष्ण परिक्रमा |
| चामर सेवा आरती | रात्रि 08:30 | चांदी के झूले में शयन दर्शन |
धोती अनिवार्य (शर्ट उतारना अनिवार्य)
साड़ी या सलवार सूट
💡 मध्व सरोवर के पवित्र जल में हाथ-पैर धोकर ही प्रवेश करें।
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