तीसरा प्रमुख दिव्य देशम · रथ सदृश पाषाण मंदिर · हेमा ऋषि तपोभूमि
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
भावार्थ: शांत स्वरूप, शेषनाग पर शयन करने वाले, कमलनयन, समस्त लोकों के स्वामी भगवान महाविष्णु को मेरा वंदन है।
महर्षि भृगु के अवतार महर्षि हेमा की पुत्री कोमलावल्ली के रूप में माता लक्ष्मी अवतरित हुईं। भगवान विष्णु अपने दिव्य धनुष "सारंग" के साथ वैकुंठ से पधारकर देवी से विवाह किए, अतः वे "सारंगपाणि" कहलाए।
12 आलवार संतों में से 7 आलवारों ने इस मंदिर के गुणगान में 51 पाशुरम (दिव्य पद) रचे हैं। मंदिर का गर्भगृह पत्थरों से बने विशाल रथ के रूप में है जिसमें पाषाण के घोड़े और हाथी जुते हुए हैं।
गर्भगृह में दो पावन प्रवेश द्वार हैं—"उत्तरायण द्वार" (जो मकर संक्रांति से खुलता है) और "दक्षिणायन द्वार" (जो कर्क संक्रांति से खुलता है)।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| विश्वरूप दर्शन | प्रातः 07:00 | तुलसी अर्चना व गोपूजा |
| सायं दीप आराधना | सायं 07:30 | महादीप व पंचमुख कर्पूर आरती |
धोती अनिवार्य, ऊपरी वस्त्र उतारना नियम
साड़ी या पारंपरिक सलवार सूट
💡 मंदिर प्रांगण में मौन और शालीनता बनाए रखें।
स्वर्ग द्वार प्रवेश व 21 दिवसीय पागल्पथु-रापठु उत्सव
तमिलनाडु के तीसरे सबसे विशाल काष्ठ रथ की नगर परिक्रमा
त्रिची (तिरुचिरापल्ली) एयरपोर्ट से 2 घंटे में कैब द्वारा कुंभकोणम पहुँचा जा सकता है।
चेन्नई एग्मोर और मदुरै से कुंभकोणम के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं। स्टेशन से 10 मिनट में ऑटो।
तंजावुर (40 किमी) और चेन्नई (280 किमी) से सीधी एक्सप्रेस बसें उपलब्ध हैं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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