सती का मस्तक व कपोल · माँ गंडकी चंडी व चक्रपाणि भैरव · शालिग्राम क्षेत्र
गण्डक्यां गण्डपाताच्च चण्डी सा चक्रपाणिकः। मुक्तिनाथे स्थिता देवी मुक्तिदात्री नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ: गंडकी में मस्तक गिरने से चंडी देवी और चक्रपाणि भैरव प्रकट हुए जो मुक्तिनाथ में मुक्ति प्रदान करते हैं।
वृंदा (तुलसी) के शाप से भगवान विष्णु काली गंडकी नदी में शालिग्राम शिला बने और सती का मस्तक गिरने से यहाँ चक्रपाणि भैरव और गंडकी चंडी प्रतिष्ठित हुईं।
हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों का यह परम पावन तीर्थ है। मंदिर के चारों ओर 108 पावन गौमुख जलधाराएं हैं जहाँ स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। पास ही ज्वाला माई मंदिर में प्राकृतिक गैस से जल पर अग्नि प्रज्वलित रहती है।
अर्धचंद्राकार रूप में बनी 108 पीतल की गौमुख जलधाराएं जिनमें बर्फ का पावन जल प्रवाहित होता है, और ज्वाला माई की अखंड ज्योति।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| 108 धारा स्नान व मंगला आरती | प्रातः 06:30 | शालिग्राम विग्रह व शक्ति वंदन |
| संध्या आरती | सायं 04:30 | धूप व शंखनाद |
गर्म ऊनी वस्त्र, जैकेट, ट्रैकिंग जूते (स्नान हेतु धोती/तौलिया)
गर्म सलवार सूट, जैकेट, शॉल
💡 ऊंचाई के कारण पर्याप्त जल पिएं और धीरे-धीरे चलें।
हजारों तीर्थयात्रियों का 108 धाराओं में महास्नान
शालिग्राम महाअभिषेक
पोखरा से 20 मिनट की रोमांचक उड़ान से जोमसोम पहुँचकर वहाँ से जीप द्वारा मुक्तिनाथ पहुँचा जाता है। काठमांडू/पोखरा से सीधी हेलीकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है।
गोरखपुर से बस द्वारा पोखरा (8 घंटे), फिर पोखरा से जोमसोम होकर यात्रा की जाती है।
पोखरा से बेनी होकर जोमसोम-मुक्तिनाथ (175 किमी) जीप द्वारा लगभग 8-9 घंटे का सफर है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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