
“कलियुग में समस्त मनोरथ सिद्धि, पारिवारिक सुख-शांति एवं दरिद्रता निवारण हेतु पावन कथा”
स्कंद पुराण के रेवाखंड में वर्णित है कि महर्षि नारद के पूछने पर स्वयं भगवान श्रीहरि ने सत्यनारायण व्रत का उपदेश दिया। कलियुग में सत्य का आचरण और भगवान का कीर्तन ही सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति निष्ठापूर्वक कथा श्रवण और प्रसाद ग्रहण करता है, उसके घर से दरिद्रता और कलह सदा के लिए समाप्त हो जाती है।
सत्यनारायण कथा परिवार के सभी सदस्यों को एक सूत्र में बांधने वाली सबसे लोकप्रिय सनातनी परम्परा है। यह कथा बच्चों को सत्य, वचनबद्धता और अहंकार न करने की गहरी नैतिक शिक्षा देती है।
किसी भी चित्र पर क्लिक करके बड़े आकार (Full Zoom) में देखें
घर पर स्वयं करने हेतु सरल एवं प्रमाणिक विधि
पूजनकर्ता पत्नी सहित पूर्वाभिमुख बैठें। हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर परिवार के कल्याण एवं मनोकामना सिद्धि का संकल्प करें।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
सरल अर्थ: परमात्मा का स्मरण कर मैं बाह्य और आंतरिक शुद्धि के साथ सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान आरम्भ करता हूँ।
सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश जी और माता गौरी का पूजन करें। इसके बाद कलश में वरुण देव का ध्यान कर षोडशोपचार से अर्चन करें।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
सरल अर्थ: हे विघ्नहर्ता गणेश जी! हमारे इस सत्यनारायण कथा अनुष्ठान को निर्विघ्न रूप से संपन्न कराएं।
शालिग्राम जी या भगवान विष्णु की प्रतिमा का शंख में पंचामृत भरकर अभिषेक कराएं। पीला वस्त्र पहनाएं, केसर चन्दन का तिलक लगाएं और तुलसी दल अर्पित करें।
ॐ नमो भगवते सत्यदेवाय। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। ॐ विष्णवे नमः॥
सरल अर्थ: सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनंत परब्रह्म भगवान सत्यनारायण को मेरा बारम्बार प्रणाम।
हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर शांत चित्त से पांचों अध्यायों की कथा सुनें (1. नारद जी को उपदेश, 2. शतानंद विप्र व काष्ठ विक्रेता, 3. साधु वैश्य की प्रतिज्ञा, 4. वैश्य का बंदी होना व मुक्ति, 5. राजा तुंगध्वज की कथा)।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
सरल अर्थ: भगवान नारायण, नर-ऋषि, सरस्वती देवी और व्यास जी को नमन कर कथा का श्रवण करते हैं।
देशी घी में भुने गेहूं के आटे की शर्करा युक्त पंजीरी, पंचामृत और केले के टुकड़ों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी पत्र अवश्य समर्पित करें।
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥
सरल अर्थ: हे गोविन्द! आपकी दी हुई वस्तु ही आपको अर्पित है, इसे स्वीकार कर हम पर प्रसन्न हों।
सपरिवार खड़े होकर "ॐ जय जगदीश हरे" आरती गाएं। इसके पश्चात उपस्थित सभी भक्तों में चरणामृत और पंजीरी प्रसाद का आदरपूर्वक वितरण करें।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे॥
सरल अर्थ: हे जगत के स्वामी! आपकी जय हो, अपने शरणागत भक्तों के समस्त संकटों को आप तत्काल हर लेते हैं।
ॐ नमो भगवते सत्यदेवाय नमः॥
अर्थ: परमसत्य स्वरूप भगवान विष्णु को मेरा नमस्कार।
लाभ: नित्य 108 बार जप करने से घर में सुख, शांति और वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्। करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि॥
अर्थ: शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियों और बुद्धि से जो भी कर्म मैंने किया है, वह सब मैं भगवान नारायण को समर्पित करता हूँ।
लाभ: अहंकार का शमन और कर्मफल की शुद्धि।
कुल 6 वस्तुएं
काशी एवं हरिद्वार के प्रामाणिक ब्राह्मणों द्वारा ऑनलाइन अथवा घर पर आकर शास्त्रसम्मत पूजन संपन्न कराया जाएगा।
पंडित सेवा बुक करें